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What happened to the Ozone Hole? | Dhruv Rathee
Lernstatistiken
GER-Niveau
Schwierigkeit
Untertitel (564 Segmente)
नमस्कार दोस्तों, अक्टूबर 1982
अंटार्कटिका के बर्फीले तूफानों के बीच
मौजूद एक रिसर्च स्टेशन में साइंटिस्ट
जोसेफ फार्मन कुछ मेजरमेंट्स ले रहे थे।
यह धरती के एटमॉस्फेयर में मौजूद ओजोन की
मात्रा नाप रहे थे एक मशीन का इस्तेमाल
करके। अचानक से ये मशीन एक रीडिंग देती है
जो बड़ी अजीब होती है। मशीन के अनुसार
एटमॉस्फेयर में ओजोन की मात्रा 40% घट
चुकी है नॉर्मल के कंपैरिजन में। जोसेफ
इसे देखकर हैरान नहीं होते हैं। उन्हें
लगता है इतना अजीबोगरीब नंबर ओजोन लेवल्स
40% कैसे नीचे गिर सकते हैं? पक्का इस
मशीन में कुछ गलती है। मशीन ढंग से काम
नहीं कर रही है। बड़ी पुरानी हो चुकी है
वैसे भी। उन्हें यह भी लगता है कि अगर सही
में ओजोन की मात्रा इतनी नीचे गिरी होती
तो पक्का नासा की हजारों सेटेलाइट्स घूम
रही है। वो उसे पकड़ लेती। तो वह अपना
सामान बांधकर वापस घर चले जाते हैं। अगले
साल अक्टूबर 1983 में वह दोबारा से आते
हैं। इस बारी वो अपने साथ एक नई मशीन लेकर
आते हैं और फिर से मेजरमेंट लेते हैं। इस
बारी जो रीडिंग आती है उसके अनुसार ओजोन
की मात्रा और भी ज्यादा घट चुकी है पिछले
साल के कंपैरिजन में। उन्हें लगता है कुछ
तो मसला है यहां पर। इतनी अनबिलीवेबल
रीडिंग पॉसिबल ही नहीं है। लेकिन फिर से
वो सोचते हैं कि पक्का अगर कोई प्रॉब्लम
होती यहां पर तो नासा जैसी बड़ी-बड़ी
एजेंसीज ढूंढ पाती उससे। तो फिर से वो
अपना सामान बांधकर घर चले जाते हैं। एक
साल बाद और अक्टूबर 1984 जब वो दोबारा से
पहुंचते हैं अपना काम करने के लिए वो
डिसाइड करते हैं कि इस बारी वो रीडिंग को
किसी और रिसर्च स्टेशन में लेंगे। अपने
ओरिजिनल रिसर्च स्टेशन से करीब 1000 मील
दूर एक बार फिर से वह मशीन को रीडिंग के
लिए सेटअप करते हैं और मेजरमेंट लेते हैं।
पता लगता है ओजोन की मात्रा और भी ज्यादा
नीचे जा चुकी है। यहां उन्हें एहसास होता
है कि यह एक इमरजेंसी की सिचुएशन है। वो
नासा के पास अपना सबूत लेकर पहुंचते हैं
और जल्द ही दुनिया को पता लगता है
अंटार्कटिका के ऊपर मौजूद ओजोन होल के
बारे में। हैरानी की बात यह थी कि ये ओजोन
होल साल भर साल बहुत ही तेजी से बड़ा हो
रहा था। नासा के साइंटिस्ट ने इसे ओवरलुक
कर दिया था। जब वो अपने सेटेलाइट डाटा पर
वापस गए देखने तो उन्हें कुछ ऐसी फोटोज
दिखाई दी। सन 1979 बिल्कुल नॉर्मल। 1980
[संगीत] और 81 थोड़ा सा कुछ ब्लू ब्लू
दिखने लगा। 1982 एक प्रॉपर होल दिखने लगा।
[संगीत] 1983 यह होल और बड़ा हो गया। और
अगले साल 1984 यह होल इतना बड़ा बन चुका
था। दुनिया भर में इस खबर को लेकर हल्ला
मच जाता है। अगर इसी [संगीत] तरीके से
ओजोन खत्म होती रही एटमॉस्फेयर से तो यह
एक भयानक इवेंट होने वाला है। धरती पर
मौजूद सारे प्लांट्स, एनिमल्स और इंसानों
के लिए खतरे की घंटी बज रही है। ओजोन खत्म
हो गई तो मानो जिंदगी खत्म हो जाएगी धरती
से। और जिस रेट से ये होल बड़ा हो रहा था,
इसे देखकर प्रिडिक्ट किया जा रहा था कि
साल तक ओजोन लेयर पूरी खत्म हो जाएगी धरती
से।
[संगीत]
अक्टूबर हो
शील्ड दशन
के
सीएफसी
इससे पहले हम कहानी में आगे बढ़े दोस्तों
ओजोन लेयर को थोड़ा समझते हैं। ओजोन एक गैस
है जैसा आपने स्कूल में भी पढ़ा होगा।
इसका केमिकल फार्मूला O3 है जहां दूसरी
तरफ ऑक्सीजन का केमिकल फार्मूला O2 होता
है। ओज़ोन का एक मॉलिक्यूल तीन ऑक्सीजन के
एटम से बनता है। लगभग 600 मिलियन साल पहले
की बात है दोस्तों कि धरती पर एक ओजोन
लेयर का जन्म हुआ था। यह अर्थ के
एटमॉस्फेयर में एक ज़ोन है जो करीब 15 से
35 कि.मी. ऊपर है धरती के सरफेस से। धरती
पर मौजूद 90% ओजोन इसी एरिया में पाया
जाता है। सरफेस से करीब 32 कि.मी. ऊपर
ओजोन की सबसे ज्यादा कंसंट्रेशन पाई जाती
है जो कि है 0.0015%।
कोई इतना बड़ा नंबर नहीं है। बहुत कम
मात्रा में गैस एक्चुअली में पाई जाती है
एटमॉस्फेयर में। लेकिन इतनी छोटी मात्रा
ही बहुत जरूरी है धरती के लिए। ओजोन
एक्चुअली में ऑक्सीजन से ही बनता है जब
सूरज की अल्ट्रावायलेट रेडिएशन आकर
ऑक्सीजन के मॉलिक्यूल से टकराती है। एक
बड़ा सिंपल केमिकल रिएक्शन यहां पर होता
है। अल्ट्रावायलेट रेडिएशन की वजह से
ऑक्सीजन का जो मॉलिक्यूल है उसमें ऑक्सीजन
के एटम्स एक दूसरे से स्प्लिट हो जाते
हैं। और ये अलग हुए एटम्स जब ऑक्सीजन के
मॉलिक्यूल्स से मिक्स होते हैं तो ओजोन की
फॉर्मेशन होती है। O2 + O = O3। अब यहां
पर एक कांस्टेंट साइकिल है जो बार-बार
देखने को मिलती है। अक्सर ओजोन का
मॉलिक्यूल भी उस ऑक्सीजन के एक एटम से
टकरा जाता है और दोबारा से ऑक्सीजन की
फॉर्मेशन हो जाती है। इन दोनों रिएक्शंस
की एक साइकिल चलती रहती है और इस पूरी
साइकिल को चैपमैन साइकिल करके बुलाया जाता
है। यह नाम रखा गया है साइंटिस्ट सिडनी
चैपमैन के ऊपर जिन्होंने इस केमिकल
रिएक्शन को एक्सप्लेन किया था पहली बार मई
1929 में। इस रिएक्शन को फोटो डिसोसिएशन
या फोटो लाइसिस बोलते हैं। फोटो यानी लाइट
और डिसोसिएशन मतलब स्प्लिट अप होना। लाइट
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