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학습 통계
CEFR 레벨
난이도
자막 (823 세그먼트)
और सोशल मीडिया कंपनीज़ के ऊपर सिर्फ
पॉलिटिशियंस को डाटा बेचने के ही एलगेशन
नहीं लगते बल्कि दंगे कराने के भी एलगेशन
लगते हैं। बिग बास्केट के 20 मिलियन
कस्टमर्स का डाटा चुरा लिया गया था कि ये
लोग जो आपका मोबाइल है जो आप अपने दोस्तों
से बात करते हैं डिवाइस के थ्रू आपकी आवाज
भी सुन सकते हैं। किसी के लिए बीजेपी देश
के लिए थ्रेट है। किसी के लिए कांग्रेस जो
है वो देश के लिए थ्रेट है और इस डाटा को
खरीद के आपके डिसीजन को मैनपुलेट कर रही
हैं। और ऐसा मैं क्यों कह रहा हूं? तो
म्यांमार में क्या हुआ कि उस टाइम पे एंटी
रोहिंग्या Facebook के ऊपर पोस्ट बहुत चल
रहे थे। Facebook को जब पता था कि दंगे हो
रहे हैं उनके पोस्ट की वजह से तो उन
कंटेंट को रोकने की बजाय उनको वो चाइना के
अंदर जो TikTok है उसका वर्जन एकदम अलग
रखती है यूएस के कंपेरेटिवली।
देखिए हम लोग जो सोशल मीडिया यूज़ करते हैं
Facebook वगैरह इसके लिए हमें एक भी रुपया
नहीं देना होता। लेकिन इन सोशल नेटवर्किंग
साइट्स के जो ओनर्स हैं वो बिलियंस ऑफ
डॉलर लगा के डेटा सेंटर वगैरह मेंटेन करते
हैं ताकि हम लोग फोटो वीडियोस ये सब अपलोड
कर पाएं। खाली Facebook की बात करें अगर
तो इनके 18 डाटा सेंटर हैं जिसकी कॉस्टिंग
$20 बिलियन डॉलर से भी ज्यादा है। ऐसे ही
हर सोशल मीडिया साइट को बिलियंस ऑफ डॉलर
लगाने होते हैं। तब जाके एक नेटवर्किंग
साइट चल पाती है। तो आज की डेट में जहां
लोग हवा गुब्बारे बांध के बेच दे रहे हैं।
ये लोग सारी चीजें फ्री में क्यों दे रहे
हैं? अब आप कह सकते हो कि हमारा जो डाटा
यूज़ होता है उससे पैसा बनाते हैं। और कुछ
लोगों का यह भी मानना है कि अगर हमारा
डाटा ले भी ले तो हमारा तो कोई सीक्रेट है
नहीं। एक दो ईमेल आईडी नेम अगर आप ले भी
जाओगे तो हमारे पास तो कुछ छुपाने को है
ही नहीं। तो देखिए इतना सिंपल नहीं है। आज
आपको एक-एक चीज डिटेल में पता चल जाएगी कि
कैसे आप जो चीज सोच रहे होते हैं उसी का
ऐड आपके सामने आ जाता है। BMW का ऐड सिर्फ
उसके पास ही क्यों जाता है जो उसको अफोर्ड
कर सकता है। गरीब लोगों के पास क्यों नहीं
जाता? और ये जो पॉलिटिकल पार्टीज हैं इनका
इस डाटा से क्या मतलब? ये इस डाटा के पीछे
क्यों पड़ी है? तो ये सारी चीजें डिस्कस
करते हैं। देखिए आज की डेट में अगर मैं
आपसे कहूं कि सबसे महंगी चीज क्या है? तो
उसका एक आंसर होगा कि अटेंशन। अगर किसी भी
तरीके से आप लोगों की अटेंशन ले आते हैं
तो आपके पास पैसा ही पैसा होगा। इतने सारे
स्पोर्ट होते हैं इंडिया के अंदर लेकिन
अटेंशन क्रिकेट को मिलती है क्योंकि
क्रिकेट सबसे ज्यादा देखा जाता है। इसलिए
क्रिकेट के पास ज्यादा पैसा है। क्रिकेट
के अंदर भी सबसे ज्यादा इंडिया पाकिस्तान
के मैच को अटेंशन मिलती है। इसलिए सारे
मैचेस में सबसे ज्यादा पैसा इंडिया
पाकिस्तान के मैच से आता है। चाहे कोई
मूवी हो, कोई प्रोडक्ट हो, किस एक्टर को
ज्यादा पैसा मिलेगा। सब डिसाइड होता है कि
किसके पास ज्यादा अटेंशन है। अगर आपके पास
कोई तरीका है जिससे आप लोगों की अटेंशन
खींच सकते हैं तो आप भी मालामाल हो सकते
हो। क्योंकि दुनिया भर में जो प्रोडक्ट्स
बनते हैं चाहे वो अच्छे हो या बुरे हो
कंपनी के जो ओनर्स होते हैं वो घर-घर जाके
उस प्रोडक्ट को नहीं दिखाते हैं बल्कि
जहां पे लोगों की अटेंशन होती है वहां पे
जाके उस प्रोडक्ट को दिखा देते हैं और ऐसे
ही लोगों को उस प्रोडक्ट के बारे में पता
चलता है। अगर एक मेट्रो स्टेशन में ज्यादा
भीड़ है और दूसरे मेट्रो स्टेशन में कम
भीड़ है तो जिस मेट्रो स्टेशन में ज्यादा
लोग होंगे वहां पे ऐड दिखाने में ज्यादा
पैसा देना होगा। अब यह जो अटेंशन का गेम
है, इसको ज्यादा से ज्यादा अपनी तरफ करने
के लिए बहुत अलग-अलग तरीके हैं। लेकिन जब
से टेक्नोलॉजी अपग्रेड हुई है, सोशल
मीडिया आया है, इन्होंने इस पूरे गेम को
बहुत ही ज्यादा अपग्रेड कर दिया है। आज की
डेट में आप देखोगे कि दुनिया की जो अमीरों
की लिस्ट है, उसमें टेक बिलिनेयर्स भरे
पड़े हैं। YouTube, Twitter, Snapchaat,
Lindin सब सोशल मीडिया प्लेटफार्म बिलियंस
में कमाते हैं। Facebook के मार्क Zerb,
Amazon के जेफ बेज़ोस, Google के लेरी पेज,
TikTok के ज़ंग गेमिंग ये सब टेक
बिलेनियर्स आज की डेट में सबसे पावरफुल
लोग हो गए हैं। तो बेसिकली इन्होंने किया
क्या है? इन्होंने अपनी ऐप के जरिए फ्री
में सोशल नेटवर्किंग दी, फ्री में
एंटरटेनमेंट दिया और लोगों का डाटा लिया
और फिर उस डाटा की मदद से लोगों की अटेंशन
कंट्रोल की और टारगेटेड एडवर्टाइजमेंट
चलाएं। 2023 में सोशल मीडिया का ओवरऑल
मार्केट साइज 231 बिलियन डॉलर्स का होने
वाला है। कई कंट्रीज की तो इतनी जीडीपी
नहीं होती है। देखिए जब भी आप किसी सोशल
नेटवर्किंग साइट पे अकाउंट बनाते हैं तो
आप और उस सोशल नेटवर्किंग साइट के बीच में
एक डील होती है और वो डील ये होती है कि
आप सोशल मीडिया साइट जो है जो ऐप है उसको
अपना डाटा देंगे और उसके बदले में सोशल
मीडिया साइट जो है वो आपको अपनी
नेटवर्किंग और एंटरटेनमेंट देंगी। अकाउंट
बनाते टाइम टर्म्स एंड कंडीशन पे जो आप
छोटा सा क्लिक करते हो वो एक लीगल
एग्रीमेंट पे साइन करने जैसा होता है जो
इसी बात की डील करता है। ऐसा करके जो सोशल
नेटवर्किंग साइट्स हैं ये पूरे वर्ल्ड के
लोगों का डाटा इकट्ठा करती हैं। उस डेटा
से पैटर्न बनाती हैं और आपकी हैबिट्स जो
हैं उनको ऑब्जर्व करती हैं और एडवरटाइजर्स
के पास जाके उनको अपना प्रोडक्ट बेचने के
लिए प्लेटफार्म देती हैं। इसको आप इस
तरीके से समझ लो कि आपने खुद की एक सोशल
नेटवर्किंग साइट बनाई और पूरे दिल्ली के
अंदर उसको फ्री में दे दिया। लोग उसको यूज़
कर रहे हैं और दिल्ली के अंदर एक दूसरे से
कनेक्ट हो रहे हैं, लाइक कर रहे हैं,
कमेंट कर रहे हैं और हर चीज़ से आपके पास
डाटा कलेक्ट हो रहा है। और अकाउंट बनाने
से पहले ही आपने क्लिक करा लिया था कि
आपका डाटा मैं यूज़ कर सकता हूं। ऐसे करके
पूरे दिल्ली के लोगों का डाटा आपके पास आ
गया। अब उस डाटा को आपने उठाया और डेटा
साइंस और अटेंशन इंजीनियर्स की मदद से
आपको यह पता चलता है कि दिल्ली के अंदर जो
सीपी का एरिया है, वहां के लोग कॉफी
ज्यादा पी रहे हैं और एक स्पेसिफिक टाइम
पे पी रहे हैं। तो आपने क्या किया? आप
कॉफी की एक बहुत बड़ी कंपनी के पास गए।
आपने उस कंपनी से कहा ये क्या टीवी में ऐड
दे रहे हो? अखबारों में ऐड दे रहे हो,
इधर-उधर बैनर लगा रहे हो। आप यह जो एड्स
हैं, यह मुझे दो और मैं आपका ऐड सिर्फ उन
लोगों को दिखाऊंगा जो कॉफी के एडिक्टेड
हैं। उनकी हर एक हैबिट मुझे पता है। मेरे
पास डाटा है और इससे कन्वर्जन बहुत ज्यादा
होगा। जो ट्रेडिशनल आपका एडवरटाइजमेंट का
तरीका है उससे ज्यादा कन्वर्जन होगा। और
वैसे भी एक अखबार में जो ऐड दिया जाता है
वो दिन में एक या दो बार खुलता है और बाकी
टाइम अखबार किसी कोने में पड़ा रहता है।
लेकिन एक मोबाइल जो है वो इंसान के सबसे
करीब होता है। अगर आप किसी के मोबाइल में
घुस गए तो फिर इससे पर्सनल और क्या हो
सकता है? तो इस तरीके से एक बेसिक मॉडल
बना जो कि अपग्रेडेड वर्जन है
एडवर्टाइजमेंट का। अब आपका यह भी क्वेश्चन
हो सकता है कि हमने तो जब Facebook अकाउंट
बनाया था तो बस हमने नाम, एज, ईमेल ये दी
थी। बहुत ज्यादा हुआ था टू फैक्टर
ऑथेंटिफिकेशन के लिए मोबाइल नंबर दे दिया
था। तो इन साइट्स को हमारे बारे में इतना
कुछ कैसे पता चल जाता है? देखिए जब आप एक
अकाउंट बनाते हो तो आप अपनी बेसिक डिटेल्स
तो देते ही हो। लेकिन आप क्या लाइक कर रहे
हो? किस पोस्ट के ऊपर कमेंट कर रहे हो?
कितने टाइम एक्टिव हो? कौन से दिन उसको
यूज़ नहीं कर रहे हो? कौन-कौन सी लोकेशन पे
जाके उसको यूज़ कर रहे हो? आप जो सोशल
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