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B1 中级 印地语 25:26 Educational

How did British Empire take over India? | Fall of Mughal Empire | Dhruv Rathee

Dhruv Rathee · 18,843,371 次观看 · 添加于 3 周前

学习统计

B1

CEFR 等级

5/10

难度

字幕 (684 片段)

00:00

नमस्कार दोस्तों, साल 1686 ब्रिटिश ईस्ट

00:03

इंडिया कंपनी मुगल एंपायर के खिलाफ जंग

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छेड़ देती है। उस वक्त गद्दी पर बैठे थे

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औरंगजेब और इस जंग को एक बहुत बड़ी

00:10

बेवकूफी बताया जाता है क्योंकि ईस्ट

00:11

इंडिया कंपनी की आर्मी मुगलों की आर्मी के

00:14

कंपैरिजन में बहुत कमजोर थी, छोटी थी। तो

00:16

यह कोई हैरानी की बात नहीं है कि बहुत ही

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आसानी से मुगलों ने ईस्ट इंडिया कंपनी को

00:21

हरा दिया। इंडिया में मौजूद कंपनी की

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फैक्ट्रीज को जब्त कर लिया गया। ढेर सारे

00:25

एआईसी के ऑफिशियल्स को अरेस्ट कर लिया गया

00:27

और जो गवर्नर थे कंपनी के उस वक्त उन्हें

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घुटने टेकने पड़े औरंगजेब के सामने। इसके

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बावजूद भी करीब 300 सालों बाद ईस्ट इंडिया

00:35

कंपनी ने इस एक फॉरेन कंपनी ने पूरे

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इंडियन सबकॉन्टिनेंट पर अपना कब्ज़ा जमा

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लिया। आज जितनी भी बड़ी से बड़ी कंपनीज़

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आपके दिमाग में आती है। Apple, Google,

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Facebook ये ईस्ट इंडिया कंपनी इन सारी

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कंपनी से ज्यादा बड़ी बन गई थी और ज्यादा

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ताकतवर भी। कैसे पॉसिबल हो पाया यह? आइए

00:52

समझने की कोशिश करते हैं आज के इस वीडियो

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में।

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ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी द कंपनी दैट

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रूल्ड इंडिया इन अ लार्ज पार्ट ऑफ द

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इंडियन सबक्टिनेंट [संगीत]

01:00

डिस्ट्रूटिंग

01:02

एक्सपोशन

01:04

ब्रिटिश वाल्टीशनल

01:10

सेट टू ट्रेड्स

01:13

टू टेक लैंड टू वेट वॉर [संगीत]

01:17

पीस

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हमारी कहानी की शुरुआत होती है दोस्तों

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साल 1600 में जब ईस्ट इंडिया कंपनी की

01:26

स्थापना करी जाती है कुछ मर्चेंट्स के

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द्वारा। यह एक जॉइंट स्टॉक कंपनी थी यानी

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इसका बिजनेस शेयर होल्डर्स के द्वारा ओन

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किया जाता था और शुरुआत में इसके सिर्फ

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125 शेयर होल्डर्स थे। इन्होंने साथ में

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मिलकर 70000 पाउंड्स रेज की एस कैपिटल। इस

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कंपनी को बनाने के पीछे मकसद था मसालों की

01:43

ट्रेडिंग करना। स्पाइसेस में ट्रेडिंग

01:44

करना साउथ ईस्ट एशिया के स्पाइस आइलैंड्स

01:48

में जाकर। अगले साल 1601 में ईस्ट इंडिया

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कंपनी अपने पहले सफर पर निकलती है और

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इंडोनेशिया में जाकर दो फैक्ट्रीज सेटअप

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करती है। उस जमाने में इंडोनेशिया के इन

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आइलैंड्स पर ऑलरेडी स्पेनिश और पोर्चुगीज़

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ट्रेडर्स काम करने लग रहे थे। साथ ही साथ

02:02

डच ट्रेडर्स ने भी रिसेंटली उसी रीजन में

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ट्रेडिंग शुरू करी थी। यह डच कंपनी

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इंग्लिश कंपनी के कंपैरिजन में ज्यादा

02:08

प्रॉफिटेबल निकलती है। इनके पास ज्यादा

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पैसा होता है और बेहतर आर्मी भी होती है।

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समय के साथ-साथ यह उस एरिया में डोमिनेंट

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पावर बन जाते हैं और ब्रिटिश ईस्ट इंडिया

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कंपनी रियलाइज करती है कि हमें अपना धंधा

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कहीं और करना पड़ेगा। इन डच लोगों ने

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हमारे लिए कोई जगह नहीं छोड़ी।

02:22

कॉन्फ्लिक्ट अवॉइड करने के लिए यह और

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जगहें ढूंढते हैं और इनकी नजर इंडिया पर

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पड़ती है। इंडिया में भी बहुत से स्पाइसेस

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और टेक्सटाइल्स थी। तो साल 1608 में इआईसी

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के मर्चेंट्स इंडिया पहुंचते हैं और लैंड

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करते हैं आज के दिन के गुजरात में सूरत

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शहर पर। देश पर मुगलों का राज था और

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मुगलों की जो आर्मी थी 4 मिलियन आर्म्ड

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लोगों की आर्मी थी। बहुत ही ताकतवर थी।

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कंपनी के ऑफिशियल्स जानते थे कि इनसे

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लड़ने का कोई फायदा नहीं है यहां पर।

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दोस्ती बनाने की कोशिश करते हैं ताकि ये

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लोग हमें यहां पर ट्रेडिंग करने दें। जो

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भी यहां पर लोकल महाराजा शहंशाह मौजूद है

02:52

उसे थोड़ा अपीस करने की कोशिश करते हैं।

02:54

तो उस जहाज के जो कैप्टन थे कैप्टन विलियम

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हॉकिंस वो जहाज से उतरते हैं और एक बड़ा

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लंबा सफर तय करते हैं आगरा तक जो कि

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मुगलों की कैपिटल थी उस वक्त। वहां

03:04

पहुंचकर वो मिलते हैं मुगल एपरर जहांगीर

03:07

से। बात करने की कोशिश करते हैं कि प्लीज

03:09

हमें परमिशन दे दो फैक्ट्री सेटअप करने

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की। हम भी ट्रेडिंग करना चाहते हैं सूरत

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में। लेकिन जहांगीर इस परमिशन को देने से

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मना कर देते हैं। इसके पीछे एक सिंपल रीजन

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यह था कि सूरत में उस वक्त पोर्चुगीज़

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ट्रेडर्स मौजूद थे और पोर्चुगीज़ ट्रेडर्स

03:21

के अच्छे रिलेशंस थे मुगलों के साथ। तो

03:23

कोई रीज़न नहीं था जहांगीर के लिए उनके

03:25

कॉम्पिटिट इंग्लिश ब्रिटिश लोगों को जगह

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दे यहां पर। तो ईआईसी के ऑफिशियल सोचते

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हैं कि मुगल टेरिटरी में हमें जगह नहीं

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मिल पाई। तो इंडिया के किसी और हिस्से में

03:33

जाकर कोशिश करते हैं जहां पर इनकी टेरिटरी

03:36

नहीं हो। जहां पर किसी और राजा का शासन

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हो। साल 161 में इनकी ये कोशिश सक्सेसफुल

03:41

प्रूव होती है जब आंध्र प्रदेश के

03:43

मछलीपट्टनम में अपनी ये पहली फैक्ट्री

03:46

खड़ी करते हैं। वहां के जो लोकल राजा थे

03:48

उन्होंने परमिशन दे दी थी। अगले कुछ सालों

03:50

में ईस्ट इंडिया कंपनी और फैक्ट्रीज

03:52

एस्टैब्लिश करती है और अपनी पकड़ मजबूत

03:54

बनाने की कोशिश करती है इंडियन सबक्टिनेंट

03:56

पर। ऐसा करते वक्त कॉन्स्टेंटली

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कॉन्फ्लिक्ट की ये सिचुएशन में आ जाते हैं

03:59

बाकी और यूरोपियन ट्रेडर्स के साथ। साल

04:01

1612 में यह वापस सूरत जाते हैं और वहां

04:04

पर पोर्चुगीज़ के खिलाफ जंग छेड़ देते हैं।

04:06

बैटल ऑफ स्वाली इसे कहा जाता है और

04:08

पोर्चुगीज़ लोग हार जाते हैं। इसके बाद से

04:10

पोर्चुगीज़ का जो इन्फ्लुएंस होता है वो

04:12

बहुत घट जाता है और मोस्टली गोवा के आसपास

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तक रिस्ट्रिक्ट रह जाता है। ईस्ट इंडिया

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कंपनी सबसे बड़ी खिलाड़ी बन जाती है इंडियन

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सबक्टिनेंट की। इस जीत के कुछ ही टाइम बाद

04:22

साल 1615 में ईस्ट इंडिया कंपनी रिक्वेस्ट

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करती है इंग्लिश किंग जेम्स वन को कि इस

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बारी वह अपनी तरफ से एक रॉयल

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रिप्रेजेंटेटिव भेजें मुगल राजा को। अगर

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वो कोशिश करेंगे तो शायद इस बारी यह मुगल

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शहंशाह मान जाएंगे। तो इंग्लिश क्राउन की

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तरफ से सर थॉमस रो को भेजा जाता है जो कि

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एक डिप्लोमेट होते हैं। यह वो कर दिखाते

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हैं जो हॉकिंस नहीं कर पाए थे। जहांगीर से

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जब यह मिलते हैं तो उनको कई बड़े-बड़े

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शानदार तोहफे देते हैं और जहांगीर उन

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तोहफों को देखकर इंप्रेस हो जाते हैं और

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इसीलिए जहांगीर एक शाही फरमान इशू करते

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हैं। एक रॉयल ऑर्डर जो कहता है कि इंग्लिश

04:54

लोगों को अब परमिशन दी जाती है कि सूरत

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में अपनी वो फैक्ट्रीज बना सकें। इतना ही

04:59

नहीं कुछ एक्सक्लूसिव राइट्स भी दे दिए

05:01

जाते हैं ईस्ट इंडिया कंपनी को कि कुछ-कुछ

05:03

टेरिटरीज में सिर्फ ईस्ट इंडिया कंपनी ही

05:05

ट्रेडिंग कर सकती है और इसके बदले एक

05:07

एनुअल पेमेंट उन्हें देनी पड़ेगी मुगल

05:09

शहंशाह को। इसके बाद ईस्ट इंडिया कंपनी की

完整字幕可在视频播放器中查看

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