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Black Holes Explained | They are not what you think they are! | Dhruv Rathee
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नमस्कार दोस्तों, 2014 में अगर आपको याद
हो डायरेक्टर क्रिस्टोफर नोलन की एक बड़ी
ब्लॉकबस्टर फिल्म आई थी इंटरस्टेलरी। इस
फिल्म में स्पेस रिलेटेड कांसेप्ट्स को
वार्म होल्स, ब्लैक होल्स, एलियन
प्लेनेट्स इन सबको बड़े ही साइंटिफिकली
एक्यूरेट तरीके से दर्शाया गया था। लेकिन
शायद सबसे भयंकर सीन इस फिल्म के एंड में
था। क्लाइमेक्स में जब फिल्म के मेन
कैरेक्टर कूपर एक ब्लैक होल के अंदर गिर
जाते हैं। इस ब्लैक होल का नाम फिल्म में
बताया जाता है गार्गेंट हुआ और कूपर अपने
स्पेसक्राफ्ट को लेकर ब्लैक होल के अंदर
गिरते हैं। शुरू में इनके आसपास सब कुछ
काला-काला होता है। कंप्लीट डार्कनेस।
लेकिन जैसे ही ये और अंदर गिरते हैं, कुछ
ग्रेन जैसे पार्टिकल्स इन्हें सामने दिखाई
पड़ते हैं। यह पार्टिकल्स इनके
स्पेसक्राफ्ट पर आकर लगते हैं। खुरेदने लग
जाते हैं। कुछ लाइट के फ्लैशेस निकलते
हैं। कुछ चिंगारियां लगती हैं और आग लगने
लग जाती है इनके स्पेसक्राफ्ट पर। इन्हें
मजबूरन इजेक्ट करना पड़ता है अपने
स्पेसक्राफ्ट से और यह ब्लैक होल के अंदर
गिरते चले जाते हैं। लेकिन फिर अचानक से
अपने आप को यह एक फाइव डायमेंशनल स्पेस के
अंदर पाते हैं। एक फाइव डायमेंशनल टैसर।
ये एक बहुत ही दिमाग हिला देने वाली चीज
है। एक ऐसी जगह है जहां पर यह अपने पास्ट
से कम्युनिकेट कर सकते हैं ग्रेविटी का
इस्तेमाल करके। यह सब देखकर एक बड़ा सवाल
आपके मन में उठा होगा। क्या यह सब पॉसिबल
है? क्या एक ब्लैक होल के अंदर सही में
ऐसा कुछ होता है? अगर हम सही में ब्लैक
होल के अंदर गिरेंगे तो क्या देखने को
मिलेगा? आइए समझने की कोशिश करते हैं इन
सारे सवालों को आज के इस वीडियो में।
ब्लैक होल्स रिमेन लार्जली अननोन 20थ
सेंचुरी।
ब्लैक होल स्पेस
हो
डार्क ग्रेविटीवरीथिंग
दे।
कहानी की शुरू से शुरुआत करते हैं।
दोस्तों ब्लैक होल्स का इतिहास कोई ज्यादा
पुराना नहीं है। आज से 100 साल पहले कोई
ब्लैक होल्स के बारे में जानता तक नहीं
था। आइंस्टाइन की थ्योरी ऑफ़ रिलेटिविटी की
वजह से ही बाद में जाकर ब्लैक होल्स की
डिस्कवरी करी गई। इस थ्योरी के एक्चुअली
में दो हिस्से हैं दोस्तों। द स्पेशल
थ्योरी ऑफ़ रिलेटिविटी और द जनरल थ्योरी ऑफ़
रिलेटिविटी। स्पेशल थ्योरी ऑफ़ रिलेटिविटी
जिसे आइंस्टाइन ने साल 1905 में पब्लिश
किया था। हमें बताती है कि कैसे स्पीड
टाइम को इन्फ्लुएंस करती है। अगर आप एक
ऐसी स्पेसशिप में बैठे हो जो बहुत तेज
उड़ने लग रही है। जिसकी स्पीड बहुत ज्यादा
है तो आपके लिए टाइम धीरे चलेगा। रिलेटिव
टू वो लोग जो स्पेसशिपिप में नहीं बैठे
हैं धरती पर ही हैं। रिलेटिव शब्द बहुत
जरूरी है क्योंकि आप जब स्पेसशिप में बैठे
होंगे तो आपको फील नहीं हो रहा होगा कि
टाइम बहुत धीरे चलने लग रहा है। आपके लिए
टाइम उतनी ही स्पीड पर चल रहा होगा जितनी
पे नॉर्मली चलता है। बस आप अगर वापस धरती
पर जाएंगे तब आपको पता चलेगा कि टाइम
कितना अलग चल रहा था। इस चीज को कनेमेटिक
टाइम डायलेशन कहा जाता है। और अगर आपने
मेरा टाइम ट्रैवलर वाला वीडियो देखा है तो
उसमें मैंने डिटेल में एक्सप्लेन किया है
यह कैसे काम करता है। अब स्पीड से ही नहीं
बल्कि ग्रेविटी से भी टाइम डाइलेशन हो
सकती है जिसे आइंस्टाइन ने बताया अपनी
जनरल थ्योरी ऑफ रिलेटिविटी। ये उन्होंने
डेवलप करी थी साल 1915 में। इसमें जितना
ज्यादा आप ग्रेविटेशनल फोर्स एक्सपीरियंस
करेंगे, उतना ही ज्यादा टाइम आपके लिए
धीरे हो जाएगा। इसे ग्रेविटेशनल टाइम
डायलेशन कहा जाता है और इंटरस्टेलर फिल्म
में इसे बढ़िया तरीके से दिखाया गया था।
जब कूपर और उनके साथी एक एक्वा प्लनेट पर
लैंड करते हैं। उस प्लनेट पर उनके लिए एक
घंटा धरती पर 7 सालों के बराबर होता है।
ऐसा इस प्लनेट पर इसलिए होता है क्योंकि
ये प्लनेट गार्गेंट टू अ ब्लैक होल के
काफी करीब होता है। तो ब्लैक होल की तरफ
से आ रहा ग्रेविटेशनल फोर्स इस पर इंपैक्ट
डालता है। अब आइंस्टाइन ने इस चीज को
विजुअलाइज करने के लिए कहा था कि एक स्पेस
टाइम का फैब्रिक इमेजिन करो। एक तरीके का
मेश इमेजिन करो जिस पर सारे प्लरी
ऑब्जेक्ट्स रखे हुए हैं। जितना ज्यादा
उनका मास है उतना ही ज्यादा वो इस स्पेस
टाइम के मेश को बेंड कर रहे हैं नीचे। और
जब यह मेश बेंड होने लग रहा है, ना सिर्फ
फिजिकल ऑब्जेक्ट्स इसकी तरफ ज्यादा
आकर्षित हो रहे हैं बल्कि टाइम की भी इससे
डलेशन होने लग रही है। और जो बाकी फॉर्म्स
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